सामूहिक बिगाड़. उसका अजाम .. मौलाना. सैयद अबुल-आला मौदूदी (रह) ह
* . अनुवाद एस- कौसर लईक़
बिसमिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान बहुत रहमवाला है 7
सामूहिक बिगाड़
कुरआन मजीद में एक अहम बात यह बयान की गई है कि अल्लाह तआला ज़ालिम नहीं है कि किसी क्रौम को ख़ाह-म-ख़ाह बरबाद कर दे, जबकि वह नेक और भला काम करनेवाली हो--
“और तेरा रब ऐसा नहीं है कि बस्तियों को जुल्म से तबाह
कर दे, जबकि उसके बाशिन्दे नेक अमल करनेवाले हों ।”
(कुरआन, सूरा-] हूद, आयत-7)
हलाक व बरबाद कर देने के मानी सिर्फ़ यही नहीं हैं कि बस्तियों को उलट दिया जाए और आबादियों को मौत के घाट उतार दिया जाए बल्कि इसकी एक सूरत यह भी है कि क़ौमों की इजतिमाइयत और एकता बिखेर दी जाए, उनक़ी सामूहिक ताक़त तोड़ दी जाए, उनको महकूम व मग्रलूब और बेइज़्ज़त व रुसवा कर * दिया जाए | ऊपर ज़िक्र किए गए क़ायदे के मुताबिक़ बरबादी और हलाकत की तमाम क्िस्मों में से कोई किस्म भी किसी क़ौम पर नहीं आ सकती जब तक कि भलाई और सुधार के रास्तों को छोड़कर बुराई, फ़लाद, सरकशी और खुदा की नाफ़रमानी के तरीक़ों पर न चलने लगे और इस तरह ख़ुद अपने ऊपर जुल्म न करने लगे। अल्लाह तआला ने इस नियम को सामने रखकर जहाँ कहीं किसी क्रीम को अज़ाब में डालने का ज़िक्र किया है, वहाँ उसका जुर्म भी प्ाथ-साथ बयान कर दिया है ताकि लोगों को अच्छी तरह मालूम गे जाए कि वह उनके अपने कर्मों ही का फल है, जो उनकी दुनिया
प्रामूहिक विगाड़ और उसका अंजाम २]
और आख़िरत दोनों को ख़राब: करता है। कुरआन में है-
“हर एक को हमने उसके अपराध ही पर पकड़ा । अल्लाह उनपर जुल्म करनेवाला नहीं था, बल्कि वे ख़ुद ही अपने ऊपर जुल्म करनेवाले थे”...
(कुरआन, सूरा-29 अनकबूत, आयत-40) दूसरी बात जो इस नियम से निकलती है. वह यह है कि हलाकत व बरबादी का सबब एक व्यक्ति की बुराई या फ़साद नहीं होता बल्कि सामूहिक और पूरी क़ौम.की बुराई और फ़साद होता है। यानी अक़रीदे और अमल की ख़राबियाँ अगर अलग-अलग तौर पर व्यक्तियों में पाई जाती हों लेकिन सामूहिक तौर पर क़ौम का दीनी (धार्मिक) और अख़लाक़ी (नैतिक) स्तर इतना ऊँचा हो कि व्यक्तियों की बुराइयाँ उसके असर से दबी रहें तो चाहे लोग अलग-अलग क़ितने ही ख़राब हों क़ौम सामूहिक तौर पर सँभली रहती है और कोई आम फ़ितना खड़ा नहीं होता जो पूरी क़ौम की बरबादी और तबाही का सबब हो। मगर जब अक़ीदे और अमल (कर्म) की ख़राबियाँ व्यक्तियों से गुज़रकर पूरी क्रौम में फैल जाती हैं और क़ौम का दीनी एहसास और अख़लाक़ी समझ इतनी बिगड़ - जांती है कि उसमें भलाई और सुधार के बजाए बुराई और ख़राबियो को फलने और फूलने का मौक़ा मिलने लगे तो उस वक़्त अल्लाह आला के करम और रहमृत की नज़र ऐसी क्रौम से फिर जाती है और वह इज़्ज़त के मक़ाम से ज़िल्लत और रुसवाई की तरफ़ गिरने लगती है। यहाँ तक कि एक वक़्त ऐसा आता है कि अल्लाह क ग़ज़ब उसपर भड़क उठता है और उसको-बिलकुल तबाह व बरबाद कर दिया जाता है।
4 ः है सामूहिक बिगाड़ और उसका अंजाम
कुरआन मजीद में इसकी बहुत॑-सी मिसालें बयाने की गई हैं। हज़रत नूह (अलैहि.) की क़ौमं को उस वक़्त बरबाद किया गया जब अक़ीदे और अमल की ख़राबियाँ उनके अन्दर जड़ पकड़ गईं और ज़मीन में फैलने लगीं औरं यह उम्मीद ही बाक़ी न रही कि उस गन्दे पेड़ से कभी कोई अच्छा फल पैदा होगा। आख़िरकार मजबूर होकर हज़रत नूह (अलैहिं.) ने अपने रब से दुआ की-
“मेरे परवरदिगार! ज़मीन पर (सत्यं के) इनकारियों में से
एक को भी ज़िन्दा न छोड़। अगर तूने इनको छोड़ दिया
तों ये तेरे बन्दों को गुमराह करेंगे और उनकी नस्ल से जो
पैदा होगा वह बदकार और .(सत्य का) सख्त इनकारी ही '
पैदा होगा ।” (कुरआन, सूरा-7] नूह, आयतें-26, 27)
आद की क्लौम को उस वब़ूंत तबाह किया गया, जबं बुराई और फ़साद ने उनके दिलों में यहाँ तक घर कर लिंया कि अत्याचारी, फ़सादी और ज़ालिम लोग उनकी क़ौंम के लीडर और शासक बन गए और भलाई और सुधार करनेवाले लोगों के लिंए सामाजिक व्यवस्था में कोई स्थान बाक़ी न रहा। कुरआन में है-
“और ये आद हैं जिन्होंने अपने रब का हुक्म मानने से
इनकार और उसके रसूलों की नाफ़रमानी की और अत्याचार
करनेवाले हक़ के हर दुश्मन के पीछे चलते रहे ॥”
(कुरंआनं, सूरा- हूद, आयत-59)
लूत (अलैहि.) की क़ौम को उस वक़्त हलाक किया गया जब उनकी अख़लाक़ी हालत इतनी घटिया और गन्दी हो गई और उनमें नेर्लज्जता (बेहयाई) यहाँ तक बढ़ गई कि खुलेंआम संभाओं और ़ज़ारों में अश्लीलता के काम करने लगे। उनमें अश्लीलता और
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बेहयाई को बुरा समझने का एहसास ही बाक़ी न रहा | कुरआन र “(लूत ने कहा कि) तुम औरतों को छोड़कर मर्दों के पास जाते हो और रास्तों में लोगों को छेड़ते और सताते हो और अपनी महफ़िलों में बदकारियाँ करते हो ।”
(कुरआन, सूरा-29 अनकबूत, आयत-29) मदयनवालों पर उस वक़्त अज़ाब आया जब पूरी क्ौम भ्रष्ट ख़यानत करनेवाली और लेन-देन के मामले में बुरी और बेईमान हूं
गई। कम तौलना और अधिक लेना कोई ऐब न रहा और क़ौम क
अख़लाक़ी एहसास (नैतिक चेतना) यहाँ तक ख़त्म हो गया कि जर
उनके इस ऐब पर रोक-टोक की जाती तो शर्म से सिर झुका लेर के बजाए वे उलटे उस रोक-टोक करनेवाले को बुरा-भला कह और उनकी समझ में न आता कि उनमें कोई ऐसा ऐब भी है ज॑ निन््दा के क़ाबिल हो। वे बदकारी करनेवालों को बुरा न समझर बल्कि जो इन हरकतों को बुरा कहता उसी को ग़लत और निन्द के क़ाबिल समझते। “और ,(शुऐेब ने कहा,) ऐ मेरी क़ौम के लोगो! इनसाफ़ के साथ नापो और तौलो और लोगों को उनकी चीज़ें कम न दो और ज़मीन में फ़लाद न फैलाओ! ... उन्होंने जवाब दिया कि ऐ शुऐेब! तू जो बातें कहता है उनमें से तो अकसर हमारी समझ ही में नहीं आतीं और हम तो तुझे अपनी क्रौम में कमज़ोर पाते हैं और-अगर तेरा क़बीला न॑ : होता तो हम तुझे संगसार (पत्थरों से मार-मारकर हलाक) कर देते ।” (कुरआन, सूरा- हूद, आयतें-85,9)
है! सामूहिक दिगाड़ और उसका अंजा
बनी-इसराईल को ज़िल्लत. व दरिद्रता और अल्लाह के ग़ज़ब व लानत में डालने का फ़ैसला उस समय हुआ जब उन्होंने बुराई और जुल्म और हरामख़ोरी की तरफ़ लपकना शुरू किया, उनकी क़ौम के नेता अवसरवादिता और मतलबपरस्ती के मर्ज़ में पड़ गए, गुनाहों के साथ उनका रिश्ता ऐसा हो गया कि उनमें कोई गरोह ऐसा न रहा, जो ऐब को ऐब कहनेवाला और उससे रोकनेवाला होता। कुरआन में है--
“तू उनमें से अकसर को देखता है कि गुनाह और अल्लाह
की हदों को पार करते और हरामख़ोरी की तरफ़ लपकते
हैं। ये कैसी बुरी हरकतें थीं जो वे करते थे। क्यों न उनके
बड़े लोग और उलमा ने उनकी बुरी बातों और हराम के
माल खाने से मना किया? यह बहुत बुरा था जो वे करते
थे!” (कुरआन, सूरा5 माइदा, आयतें-62, 68)
“बनी-इसराईल में से जिन लोगों ने इनकार किया उनपर
दाऊद (अलैहि.) और ईसा इब्नेगमरयम (अलैहि.) की
ज़बान से लानत कराई गई। इसलिए कि उन्होंने सरकशी , की और वे हद .से गुज़र जाते थे। वे एक-दूसरे को बुरे कामों से नहीं रोकते थे!” (कुरआन, सूरा-5 माइदा, आयतें-78, 79) इस आख़िरी आयत की व्याख्या) में नबी (सल्ल-) से जो हदीसें नक़ल की गई हैं .वे कुरआन मजीद के मक़सद को और अधिक स्पष्ट कर देती हैं। सभी हदीसों का ख़लासा (सारांश) यह है कि नबी (सल्ल.) ने कहा- “बनी-इसराईल में जब बदकारी फैलनीः शुरू हुई तो हाल
सामूहिक बिगाड़ और उसका अंजाम | थर
यह था कि एक व्यक्ति अपने भाई या दोस्त या पड़ोसी को
बुरा काम करते देखता तो उसको मना करता और कहता
कि खुदा का ख़ौफ़ कर | मगर उसके बाद वह उसी शख्स
के साथ घुल-मिंलकर बैठता और यह बुराई का देखना
उसको उस बदकार (बुराई करनेवाले) के साथ मेल-जोल
और खाने-पीने में शामिल होने से न रोकता, जब उनकी
यह दशा हो गई तो उनके दिलों पर एक-दूसरे का असर
पड़ गया और अल्लाह ने सबको एक रंग में रंग दिया और
उनके नबी दाऊद (अलैहि.) और ईसा-बिन-मरयम (अलैहि.)
की ज़बान से उनपर लानत की ।”
(हदीस : तिरमिजी)
हदीस बयान करनेवाले कहते हैं कि जब नबी (सल्ल.) तक़रीर करते हुए इस कथन पर पहुँचे तो जोश में आकर उठ खड़े हुए और कहा-
“क़सम है उस पाक हस्ती की जिसके हाथ में मेरी जान
है, तुमपर लाज़िम है कि नेकी का काम करो और बुराई से
रोको और जिसको बुरा काम करते देखो उसका हाथ पकड़
लो और उसे सीधे रास्ते की तरफ़ मोड़ दो और इस मामले
में हरगिज़ उदारता न दिखाओ, वरना अल्लाह तुम्हारे दिलों
पर भी एक-दूसरे का असर डाल देगा और तुमपर भी उसी
तरह लानत करेगा जिस तरह बनी-इसराईल पर की ।”
अक़ीदे और अमल की ख़राबी एक-दूसरे के सम्पर्क से फैलनेवाली बीमारी की तरह है। महामारी में कोई मर्ज शुरू में कुछ कमज़ोर लोगों पर हमला करता है | अगर हवा-पानी अच्छा हो, स्वास्थ्य-रक्षा
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के उपाय दुरुस्त हों, गन्दगियों और प्रदूषणों को दूर करने का काफ़ी इन्तिज़ाम हो और मर्ज़ से प्रभावित होनेवाले मरीज़ों का वक़्त पर इलाज कर दिया जाए तो मर्ज़ आम महामारी का रूप नहीं लेने पाता और आम लोग उससे सुरक्षित रहते हैं, लेकिन अगर डॉक्टर बेपरवाह हों, स्वास्थ्य-रक्षक विभाग बेफ़िक्र हो, सफ़ाई के प्रबन्धक नजासतों और गन्दगियों को नज़रअन्दाज़ करनेवाले हो जाएँ तो धीरे-धीरे मर्ज़ के कीटाणु वातावरण में फैलने लगते हैं और उसको इतनां ख़राब कर देते हैं कि सेहत के बजाए मर्ज़ के लिए मददगार हो जाता है। आख़िरकार जब बस्ती के आम लोगों को हवा, पानी भोजन, लिबास, मकान मंतलब यह कि कोई चीज़ भी गन्दगी और ज़हर से पाक नहीं मिल्नती तो उनकी जीवन-शक्ति जवाब देंने लगती है और सारी-की-सारी आबादी आम महामारी से ग्रस्त हो जाती है। फिर ताक़तवर-से-ताक़तवर व्यक्ति के लिए भी अपने-आपको मर्ज़ से बचाना मुश्किल हो जाता है। ख़ुद इलाज करनेवाले डॉक्टर और सफ़ाई के ज़िम्मेदार और आम लेगों की सेहत की रक्षा - करनेवाले तक बीमारी में फैंस जाते हैं और वे लोग भी हलाकत से सुरक्षित नहीं रहते जो अपनी हद तक सेहत की हिफ़ाज़त के सभी उपायों को अपनाते हैं और दवाएँ इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि हवा का ज़हरीलाप॑न, पानी की गन्दगी, भोजन के संसाधनों की खराबी और ज़मीन के प्रदूषण का उनके पास कया इलाज हो सकता है। इसी पर अख़लाक़ और आमाल की ख़राबी और अक़ीदे की गुमराहियों के बारे में भी अनुमान लगा लीजिए। उलमा क़ौम का इलाज करनेवाले डॉक्टर हैं| हुकूमत के लोग और दौलतवाले सफ़ाई और सेहत की हिफ़ाज़त के ज़िम्मेदार हैं। क्रीम की ईमानी ग़ैरत और
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जमाअत का अख़लाक़ी एहसास जीवन-शक्ति की तरह है। इजतिमाई (सामूहिक) माहौल की हैसियत वही है, जो हवा, पानी, भोजन और लिबास व मकान की है और क़ोमी ज़िन्दगी में दीन व अख़लाक़ के एतिबार से भलाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने का वही मक़ाम है जो शारीरिक सेहत के एतिबार से सफ़ाई व स्वास्थ्य-रक्षा के उपायों का है। जब उलमा और बड़े अधिकारी लोग अपने असल फ़र्ज़ यानी अम्र-बिल्न-मारूफ़ (भलाई का हुक्म देने) और नहूय अनिल-मुन्कर (बुराई से रोकने) को छोड़ देते हैं और बुराई व ख़राबी के साथ उदारता का व्यवहार करते हैं। इससे गुमराही और बद-अख़लाक़ी क्ौम के लोगों में फैलनी शुरू हो जाती है। और क़ौम की ईमानी ग्ैरत कमज़ोर होती चली जाती है, यहाँ तक कि सारा सामाजिक माहौल ख़राब हो जाता है। क़ौमी ज़िन्दगी का वातावरण भलाई और सुधार के लिए गैर-मुनासिब और बुराई और ख़राबी के लिए अनुकूल हो जाता है। लाग नेकी से भागते हैं औ बुराई से नफ़रत करने के बजाए उसकी तरफ़ खिंचने लगते हैं, नैतिक मूल्य उलट जाते हैं, ऐब हुनर बन जाते हैं और हुनर ऐब। उस वक़्त गुमराहियाँ और बद-अख़लाक़ियाँ ख़ूब फलती-फूलती हैं और भलाई का कोई बीज पनपने के क़ाबिल नहीं रहता। ज़मीन, हवा और पानी सब उसकी परवरिश करने से इनकार कर देते हैं, क्योंकि उनकी सारी ताक़त बुरे व ख़राब पेड़-पौधों को पालने-पोसने में लग जाती है। जब किसी क़ौम की यह दशा हो जाती है तो फिर वह अल्लाह के अज़ाब की हक़दार हो जाती है। |
अतः उसपर ऐसी आम तबाही नाज़िल होती है जिससे कोई नहीं बचता, चाहे कोई ख़ानक़ाहों में बैठा हुआ रात-दिन इबादत
0 सामूहिक वियराड़ और उसका अंजाम
करता रहा हो। मे इसी के बारे में कुरआन मजीद में कहा गया है- “बचो उस फ़ितने से जो सिर्फ़ उन्हीं लोगों को मुसीबत में न डालेगा, जिन्होंने तुममें से अत्याचार किया है।” (कुरआन, सूरा-8 अनफ़ाल, आयत-25)
'* इब्ने-अब्बास (रज़ि.) इसी आयत की व्याख्या में कहते हैं कि अल्लाह तआला का मंशा इस आयत से यह है कि बुराई को अपने सामने न ठहरने दो | क्योंकि अगर तुम बुराई के ताल्लुक़ से उदारता अपनाओगे और उसको फैलने दोगे तो अल्लाह की तरफ़ से अज़ाब नाज़िल होगा और उसकी लपेट में अच्छे और बुरे सब आ जाएँगे। ख़ुद नबी (सल्ल.) ने इस आयत की व्याख्या इस तरह की है-
“अल्लाह ख़ास लोगों के अमल पर आम लोगों को अज़ाब
नहीं देता मगर जब वे अपने सामने बुराई को देखें और
उसको रोकने की सामर्थ्य और ताक़त रखने के बावजूद
उसको न रोकें तो अल्लाह ख़ास और आम सबको अज़ाब
में डाल देता है।” (हदीस : तबरानी)
क़ौम की अख़लाक़ी और दीनी सेहत को बनाए रखने का सबसे बड़ा ज़रिआ यह है कि उसके हर व्यक्ति में ईमानी गैरत और अख़लाक़ी एहसास मौजूद हो, जिसको नबी (सल्ल.). ने एक सटीक शब्द “हया” यानी लज्जा नाम दिया है। हया असल में ईमान का एक अंश है जैसा कि नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया है- ... इन्नल-हया मिनल-ईमान”- यानी हया- ईमान में से है। एक मौक़े पर जब नबी (सल्ल.) से पूछा गया कि हया दीन (धर्म) का एक अंग है? तो आप (सल्ल.-) ने फ़रमाया- बल-हु-वद्दी-नु
सामूहिक बिगाड़ और उसका अंजाम
कुल्लु-हू- यानी वह पूरा दीन है।
हया (लज्जा) का मतलब यह है कि बुराई और गुनाह के कामों से मन (नफ़्स) में कुदरती तौर पर नफ़रत पैदा हों और दिल उससे घृणा करे। जिस व्यक्ति में यह (गुंण) मौजूद होगा वह न सिर्फ़ बुराइयों से बचेगा, बल्कि दूसरों में भी उनंको बर्दाश्त न कर सकेगा, वह बुराइयों के प्रति उदार न होगा जुल्म और गुनाहों से समझौता करना उसके लिए मुमकिन न होगा | जब वह बुराई होते देखेगा तो उसकी ईमानी ग़ैरत जोश में आ जाएगी और वह उसको हाथ से या ज़बान से मिटाने की कोशिश करेगा, या कम-से-कमं उसंका दिल इस ख़ाहिश से बेचैन हो जाएगा कि उस बुराई को मिटा दे। हदीस में है-
“तुममें से जो कोई बुराई को देखे, वह उसे अपनें हांथ से
मिटा दे और अगर ऐसा न कर सकता हो तो ज़बान से कहे
और अगर यह भी न कर सकता हो तो दिल से बुरा माने
और यह सबसे कमज़ोर ईमान है।” (हदीस : मुस्लिम)
जिस क्रौम के लोगों में आम तौर पंर यह गुण मौजूद होगा. उसका धर्म महफ़ूज़ रहेगा और उसका अख़लाक़ी स्तर कंभी न गिर
सकेगा, क्योंकि उसका हर व्यक्ति दूसरे के लिएं जायजा लेनेवाला
और निगराँ होगा और अक़ीदे और अमल की ख़राबी को उसमें दाख़िल होने के लिए कोई राह न मिल सकेगी।
कुरआन मजीद का मक़सद असल में ऐसी ही एक आइडियल सोसायटी (आदर्श समाज) बनाना है, जिसका हर व्यक्ति अपने दिली रुझान और अपनी फ़ितरी ग़ैरत व हया और ख़ालिस अपने ज़मीर की हरकतों का जायज़ा लेने और निगरानी करने के फ़र्ज़ को
9 सामूहिक बिगाड़ और उसका अंजाम
अंजाम दे और किसी मेहनताने के बगैर ख़ुदा का फ़ौजदार बना फिरे- “और इस तरह हमने तुमको इनसाफ़ करनेवाली उम्मत - और बीच की राह चुननेवाली उम्मत बनाया है ताकि तुम लोगों पर निगरानी करनेवाले बनो और रसूल तुम्हारा निगराँ हो”. (कुरआन, सूरा-2 बक़॒रा, आयत-49) इसी लिए मुसलमानों को बार-बार बताया गया है कि नेकी का हुक्म देना और बुराई से रोकना तुम्हारी क्रौमी ख़ासियत है, जो हर मुसलमान -मर्द और औरत में निश्चित तौर पर होनी चाहिए। कुरआन में है- “तुम बेहतरीन क़ौम हो, जिसे लोगों के लिए बनाया गया है। (क्योंकि) तुम नेकी का हुक्म करते हो, बुराई से रोकते ' हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो ।” (कुरआन, सूरा-3 आले-इमरान, आयत-0) “मोमिन मर्द और मोमिन औरतें एक-दूसरे के मददगार हैं। नेकी का हुक्म करते और बुराई से रोकते हैं।” (कुरआन, सूरा-9 तौबा, आयतत-7) “वे नेकी का हुक्म करनेवाले और बुराई से रोकनेवाले और - अल्लाह की हदों की हिफ़ाज़त करनेवाले हैं” (कुरआन, सूरा-9 तौबा, आयत-2) “ये वे लोग हैं, जिन्हें हम अगर ज़मीन में हुकूमत देंगे तो ये नमाज़ क्रायम करेंगे, ज़कात देंगे, नेकी का हुक्म करेंगे और बुराई से राकेंगे।” (कुरआन, सूरा-22 हज, आयत-4॥) अगर मुसलमानों का यह हाल हो तो उनकी मिसाल उस बस्ती
सामूहिक वरिगाड़ और उसका अंजाम ]9
जैसी होगी जिसके हर बाशिन्दे में सफ़ाई और सेहत की हिफ़ाज़त * का एहसास हो। उसका हर व्यक्ति न सिर्फ़ अपने जिस्म और अपने घर को पाक-साफ़ रखे, बल्कि बस्ती में जहाँ कहीं गन्दगी और बुरी चीज़ देखे उसको दूर कर दे और किसी जगह भी गन्दगी और बुरी चीज़ों के रहने को बर्दाश्त न करता हो। ज़ाहिर है कि ऐसी बस्ती का वातावरण पाक और साफ़ रहेगा उसमें बीमारी के कीटाणु परवरिश न पा सकेंगे और अगर इक्का-दुक्का कोई व्यक्ति कमज़ोर और बीमार होगा तो उसका वक़्त पर इलाज हो जाएगा या कम-से-कम उसकी बीमारी सिर्फ़ व्यक्तिगत बीमारी होगी। दूसरों तक फैलकर आम महामारी की सूरत न अपना सकेगी। लेकिन अगर मुसलमानों की क्ौम उंस बुलंद दर्जे पर न रह सके तो सोसायटी की दीनी (धार्मिक) व अख़लाक़ी सेहत को बरक़रार रखने के लिए कम-से-कम एक ऐसा गरोह तो उनमें ज़रूर मौजूद होना चाहिए जो हर वक़्त इस ख़िदमत पर लगा रहे और अक़ीदे की गन्दगियों और नैतिकता व अमल की ख़राबियों को दूर करता रहे। कुरआन कहता है- “तुममें एक गरोह ऐसा होना चाहिए जो भलाई की तरफ़ बुलानेवाला हो। नेकी का हुक्म दे और बुराई से रोके ।” (कुरआन, सूरा-8 आले-इमरान, आयत-04) यह गरोह उलमा और हाकिमों का गरोह है, जिसका नेकी का हुक्म देने और बुराई से रोकने में लगे रहना उतना ही जरूरी है जितना शहर की सफ़ाई और सेहत की रक्षा करनेवाले विभाग का अपने काम में सख्ती के साथ लगा रहना। अगर ये लोग अपने फ़र्ज से ग़ाफ़िल हो जाएँ और क़ौम में एक गरोह भी ऐसा बाक़ी न रहे
]4 है | सामूहिक बिगाड़ और उसका अंजाम
जो भलाई और सुधार की तरफ़ बुलानेवाला और बुराइयों से रोकनेवाला हो तो दीन और अख़लाक़ के एतिबार से क़ौम की तबाही उसी प्रकार यक्रीनी है जिस प्रकार जिस्म और जान के एतिबार से उस बस्ती की तबाही यक़ीनी है, जिसमें सफ़ाई व सेहत की हिफ़ाज़त का कोई इन्तिज़ञाम न हो। गुज़री हुई क्रौमों पर जो तबाहियाँ नाज़िल हुई हैं वे इसी लिए हुई हैं कि उनमें कोई गरोह भी ऐसा बाक़ी नहीं रहा था जो उनको बुराइयों से रोकता और भलाई व सुधार पर क़ायम रखने की कोशिश करता। : “तुमसे पहली क़ौमों में कम-से-कम ऐसे समझदार क्यों न हुए जो ज़मीन में फ़साद से रोकनेवाले होते। सिवाए कुछ आदमियों के जिनको हमने उनमें से बचाकर निकाल दिया ।” (कुरआन, सूरा-] हूद, आयत-6) “क्यों न उनके आलिमों और सरदारों ने उनको बुरी बातें कहने और हराम खाने से रोका?” . (कुरआन, सूरा-5 माइदा, आयत-63) अतः क़ीम के उलमा और हाकिमों पर सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। वे सिर्फ़ अपने ही आमाल (कर्मो) के प्रति जवाबदेह नहीं बल्कि पूरी क़ौम के आमाल की जवाबदेही भी एक बड़ी हद तक उनपर आती है। ज़ालिम व अत्याचारी और ऐशपसंद हुक्मरान और ऐसे हुक्मरानों की चापलूसी करनेवाले उलमा और धर्मगुरुओं का तो खैर कहना ही क्या है! उनका जो कुछ अंजाम-खुदा के यहाँ होगा उसके ज़िक्र की ज़रूरत नहीं | लेकिन जो हुक्मरान, उलमा और धर्मगुरु अपने महलों ' और अपने घरों और अपनी ख़ानक़ाहों में बैठे हुए परहेज़गारी, तक़्वा और इबादत वगैरा में लगे हुए हैं, वे भी ख़ुदा के यहाँ जवाबदेही
सामूहिक बिगाड़ और उसका अंजाम _ ]5
से बच नहीं सकते। क्योंकि जब उनकी क़ौम पर हर तरफ़ से 'गुमराही और बद-अख़लाक़ी के तूफ़ान उमड़े चले आ रहे हों, तो उनका काम यह नहीं है कि एकांत में सिर झुकाए बैठे रहें, बल्कि उनका काम यह है कि मैदान का बहादुर बनकर निकलें और जो कुछ ताक़त और असर अल्लाह ने उनको दिया हुआ है उसको काम में ल्ञाकर उस तूफ़ान का मुक़ाबला करें। तूफ़ान को दूर करने की ज़िम्मेदारी निस्सन्देह उनपर नहीं, मगर उसके मुक़ाबले में अपनी पूरी ताक़त लगा देने की ज़िम्मेदारी तो यक्नीनन उनपर है। अगर वे इससे बचेंगे और इनकार करेंगे, तो उनकी इबादत .और रियाज़त, तपस्या और सिर्फ़ उनकी अपनी परहेज़गारी उनको आख़िरत में ख़ुदा के सामने जवाबदेही से बचा नहीं सकती | आप सफ़ाई-विभाग के उस अफ़सर को कभी ज़िम्मेदारी से बरी नहीं ठहरा सकते, जिसका हाल यह हो कि शहर में महामारी फैल रही हो और हज़ारों आदमी मर रहे हों, मगर वह अपने घर में बैठा खुद अपनी और अपने बाल-बच्चों की जान बचाने के उपाय कर रहा हो और उसे आम आदमी की चिंता न हो। अगर आम नागरिक ऐसा-करें तो कुछ ज़्यादा एतिराज़ के लायक़ नहीं, लेकिन सफ़ाई-विभाग का अफ़सर ऐसा करे तो उसके मुजरिम होने में सन्देह नहीं किया जा सकता। (तर्जमानुल-क़ुरआन, मार्च 9$5 ई.)
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]6 - सामूहिक बिगाड़ और उसका अंजाम